Thursday, March 24, 2011

यादों की महक --मो सम कौन कुटिल खल ...... ? से साभार

कभी तुम्हारी महक से बहकता रहा था मैं,
तुम्हारे प्रेम की शीतलता से दहकता रहा था मैं,
एक अरसे बाद लौटा है, वो गुज़रा वक्त माज़ी का,
जिसे ओढ़ा था, पहना था, जिससे चहकता रहा था मैं।

तुम नहीं हो, लेकिन तुम्हारी यादों की महक अब भी बहकाती है,
या फ़िर तुम्हारी महक की यादें हैं, जो हंसाती हैं रुलाती हैं,
बहकती तुम ही थीं पहले, तुम्हीं मुझको बचाती थीं.
सताती भी तुम्हीं थी और तुम्हीं मुझको मनाती थीं।


तुम्हें तब रोक न पाया, न तुमको बांध पाया था,
याद हर सांस करती थी, कहां मैं भूल पाया था,
जाना था, गई थी तुम, तो वापिस फ़िर क्यूं आती हो,
चेहरे तो बदलते  हैं, महक से पकड़ी जाती हो।


अब जब लौट आई हो, तो फ़िर से वापिस भी जाओगी,
मेरी फ़िक्र मत करना, मुझे तुम यहीं पर पाओगी,
न पहले रोक पाया था, न अब ही रोक पाऊंगा,
तुम्हारी बात पर तुमको कहां मैं टोक पाऊंगा।

Friday, March 18, 2011

होली कि हार्दिक शुभ कामनाएं

सर्व प्रथम सभी को होली कि हार्दिक शुभ कामनाएं



Tuesday, March 15, 2011

भीगी पलके

जब भी सोचा आप को हमने,क्यों भीग गयी हमारी पलके.
इस एकाकी जीवन मैं जब मान चुके थे दुःख को साथी..
आपने आकर सजा दिए क्यों, खुशियों के मेले..
छोटा सा है दामन मेरा,  इतनी खुशियाँ कहाँ रखूंगा..
डरता हूँ कहीं बिखर ना जाए, उस पल को मैं सह ना सकूंगा..
कहता है मन तोड़ दूं  बंधन, जीवन कर दूं आप को अर्पण...
पर ना जाने किस आशंका से, बार बार ये आँखें छलके..
जब भी सोचा आप को हमने क्यों भीग गयी हमारी पलके..

                                                                                  प्रदीप दुबे 'लल्तेश'