जब भी सोचा आप को हमने,क्यों भीग गयी हमारी पलके.
इस एकाकी जीवन मैं जब मान चुके थे दुःख को साथी..
आपने आकर सजा दिए क्यों, खुशियों के मेले..
छोटा सा है दामन मेरा, इतनी खुशियाँ कहाँ रखूंगा..
डरता हूँ कहीं बिखर ना जाए, उस पल को मैं सह ना सकूंगा..
कहता है मन तोड़ दूं बंधन, जीवन कर दूं आप को अर्पण...
पर ना जाने किस आशंका से, बार बार ये आँखें छलके..
जब भी सोचा आप को हमने क्यों भीग गयी हमारी पलके..
प्रदीप दुबे 'लल्तेश'
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