कभी तुम्हारी महक से बहकता रहा था मैं,
तुम्हारे प्रेम की शीतलता से दहकता रहा था मैं,
एक अरसे बाद लौटा है, वो गुज़रा वक्त माज़ी का,
जिसे ओढ़ा था, पहना था, जिससे चहकता रहा था मैं।
या फ़िर तुम्हारी महक की यादें हैं, जो हंसाती हैं रुलाती हैं,
बहकती तुम ही थीं पहले, तुम्हीं मुझको बचाती थीं.
सताती भी तुम्हीं थी और तुम्हीं मुझको मनाती थीं।
तुम्हें तब रोक न पाया, न तुमको बांध पाया था,
याद हर सांस करती थी, कहां मैं भूल पाया था,
जाना था, गई थी तुम, तो वापिस फ़िर क्यूं आती हो,
चेहरे तो बदलते हैं, महक से पकड़ी जाती हो।
अब जब लौट आई हो, तो फ़िर से वापिस भी जाओगी,
मेरी फ़िक्र मत करना, मुझे तुम यहीं पर पाओगी,
न पहले रोक पाया था, न अब ही रोक पाऊंगा,
तुम्हारी बात पर तुमको कहां मैं टोक पाऊंगा।
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ReplyDeleteभारतीय ब्लॉग लेखक मंच
डंके की चोट पर
शुभकामनाएं
ReplyDeleteविकास जी, नेट खंगालते हुये आज ही देखी ये पोस्ट।
ReplyDeleteआपको पसंद आई थी रचना और आपने अपने ब्लाग पर स्थान दिया, उसके लिये शुक्रिया दोस्त।